

NL Hafta
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Weekly wrap of events of the week peppered with context, commentary and opinion by a superstar panel. Click here to support Newslaundry: http://bit.ly/paytokeepnewsfree Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.
Episodes
Mentioned books

Apr 27, 2019 • 54min
एनएल चर्चा 66: सीजेआई विवाद, बिलकीस बानो, श्रीलंका में आतंकी वारदात और अन्य
ग़ालिब का एक शेर है- “हम वहां से हैं जहां से हमको भी/ कुछ हमारी ख़बर नहीं आती”. मौजूदा वक़्त में देश ऐसे ही दौर से गुज़र रहा है. पंजाबी के कवि ‘पाश’ के शब्दों में कहें तो एक हद तक यह वह दौर भी है, जब बिना ज़मीर होना ज़िंदगी की शर्त बन गयी है. ठीक उसी वक़्त यह बात जोर-शोर से कही जा रही है कि सारे सवालों में सबसे ऊपर है देश और देश की सुरक्षा का सवाल तो इसके ठीक समानांतर एक विडंबना भी है कि हमें देश की इस तथाकथित सुरक्षा से खतरा है.इस हफ़्ते की चर्चा ऐसे वक़्त में आयोजित हुई जब इस तरह की तमाम चर्चाओं के बीच देश के प्रधानमंत्री ‘पूर्णतः अराजनैतिक साक्षात्कार’ देने के बाद लोकसभा चुनावों में ‘पूर्ण बहुमत’ हासिल करने के अभियान में लगे हुये थे. इसी कड़ी में बनारस की सड़कों पर जनता ने ख़ुद को फ़कीर कहने वाले प्रधानमंत्री का शक्ति-प्रदर्शन देखा. चुनावी सरगर्मियों के बीच नेताओं के बयान पूरे परिदृश्य को सनसनीख़ेज बना रहे थे. यह वह समय भी था, जब देश-विदेश से कुछ दुर्भाग्यपूर्ण ख़बरें आयीं तो कुछ ख़बरें ऐसी भी रहीं जिनसे डगमगाते भरोसे को तनिक बल मिला.इस हफ़्ते की चर्चा में भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनकी एक महिला कर्मचारी द्वारा लगाया गया यौन-उत्पीड़न का आरोप और न्यायपालिका के दायरे में इस संबंध में हुई उठा-पटक, 2002 के गुजरात दंगे की पीड़िता बिलकीस बानो के बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट का मुआवजे का निर्णय व उसके निहितार्थ, देश का चुनावी परिदृश्य और श्रीलंका में हुई आतंकवादी घटना को चर्चा के विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्द्धन ने शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुये. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.इस तरह मामले की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ख़ुद सवालों के घेरे में आने के बाद अपनायी गयी प्रक्रिया व जस्टिस रंजन गोगोई द्वारा उठाये गये क़दम को आप कैसे देखते हैं?जवाब देते हुए अनिल कहते हैं- “यह मामला सामने आया तो लोगों ने पहला सवाल यह करना शुरू किया कि ऐसे मामलों में कानूनी स्थिति क्या है क्योंकि आरोप चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया पर लगे थे. किसी का स्कॉलर होना, कानून का जानकार होना एक अलग बात है लेकिन इस वजह से यह नहीं मान लेना चाहिए कि जो बहुत बड़ा स्कॉलर है या जानकार है, वह अपनी यौन विकृतियों व यौन इच्छाओं से भी विवेकपूर्ण ढंग से निपट पायेगा. आनन-फानन में जस्टिस रंजन गोगोई ने एक समिति बनायी और समिति की कार्यवाही से बहुत ख़राब संदेश गया. जस्टिस गोगोई के इस कहने को देखें- ‘यह सुप्रीम कोर्ट को और मुझे निशाने पर लेने की कोशिश है, मुझे ख़रीद पाने में नाकाम रहे तो यह रास्ता अपनाया गया’- तो हमारे यहां यही होता रहा है. आरोपी यह कहता रहा है कि आप मुझसे कैसे यह उम्मीद कर रहे हैं कि मैं इस तरह का काम करूंगा, मुझे विरोधियों द्वारा साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. तो यह जो तर्क रंजन गोगोई दे रहे हैं यह कोई नया तर्क नहीं है.”अतुल आगे कहते हैं कि हमारे समाज का यह सामूहिक चरित्र रहा है कि वह इस तरह के किसी मामले में फ़ौरी तौर पर पीड़िता के आरोपों को खारिज़ कर देता है. मामले को संजीदगी से देखने-सुनने का कोई ख़ास चलन हमारे यहां नहीं है. जस्टिस रंजन गोगोई द्वारा अपने पक्ष में बयान दिये जाने व पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा कर देने से भी इस बात की तरफ़ ही संकेत मिलता है कि सबसे पहले चरित्र हनन उसी का होता है जो पीड़िता है. तयशुदा नियम-प्रक्रिया की तरफ़ ध्यान दिये बिना जस्टिस गोगोई द्वारा भी ऐसा ही किये जाने को आप कैसे देखते हैं?जवाब देते हुये आनंद कहते हैं- “इसमें एक पुनर्विचार उच्चतम न्यायालय के ढांचे के संबंध में होना चाहिए. जो मुख्य न्यायाधीश होता है वह न केवल न्यायिक मामलों का प्रमुख होता है बल्कि न्यायालय के साथ-साथ वह इसकी प्रशासनिक इकाई का भी मुखिया होता है. गोगोई उस प्रशासनिक इकाई की भी अध्यक्षता कर रहे हैं. यह जो फ़ौरी तौर पर तीन जजों की बेंच बनाकर मामला खारिज़ कर दिया गया यह जस्टिस गोगोई ने प्रशासनिक अध्यक्ष के तौर पर किया. शायद इसमें ‘सेपरेशन ऑफ़ पॉवर’ की सख्त जरूरत है. और इस पर विचार होना चाहिए कि क्या जुडीशियल पॉवर के साथ-साथ एडमिनिस्ट्रेटिव पॉवर भी मुख्य न्यायाधीश को दिया जाय?”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 26, 2019 • 2h
Hafta 221: India's Growth Story, Sadhvi Pragya, Chief Justice of India & more
In this week’s episode, host Abhinandan Sekhri is joined by Madhu Trehan, Raman Kirpal, Anand Vardhan, and journalist and author Puja Mehra.The podcast kicks off with a deconstruction of Mehra’s book, The Lost Decade (2008-18): How India's Growth Story Devolved into Growth Without a Story. Abhinandan asks Puja why she believed that the decade was indeed lost. In response, she says both Prime Ministers (Manmohan Singh and Narendra Modi) were equally responsible for ineffectively dealing with the crisis. She also states that temporary emergency measures were relied upon to compensate for a mammoth crisis that demanded a permanent solution.She adds, “When an economy grows at that rate [8.8 per cent GDP growth] and is hit by a crisis, a shock, to bring it back to that level you need to take some steps. That follow-through was not undertaken.” When Abhinandan asks her if she believed that the Modi government’s economic agenda was cemented in a cultural singularity, she says that the government’s attitude is more symptomatic of a policy inattention than anything else.She describes her book as a documentation of governance in the last ten years that analyses the policies adopted while also discussing the policies that should have been. Talking about its essence, she says, “The whole argument of my book is that our politicians just don’t listen to expert advice and they assume that an economy as large as India, as complex as India, can be driven by policies that are crafted keeping political objectives in mind with complete disregard for underlying economics.” The discussion then moves to sexual harassment allegations levied against Chief Justice of India Ranjan Gogoi. Madhu makes a compelling case of the escalating hubris of the Supreme Court. She says, “The Indian judiciary, for decades, has avoided any accountability. Every time they are asked for accountability, they behave like [they] are above the law. Well [they’re] not. It’s a democracy.” Puja says she prefers a system governed by rules rather her perception of the credibility of individuals in it so that one’s faith in the system remains uninfluenced by fallible individuals.Sadhvi Pragya’s media portrayal was next on the panel's list. Anand says, “In this age when you have preconceived ideas about political inclinations of a journalist, it becomes very easy to pigeonhole them and say that this will be this kind of interview…in that case it is important that [the journalist] asks controversial questions…but it is not a debate to be settled in an interview.”The panel also discusses the granularity of demonetisation, the significance of Priyanka Gandhi Vadra not contesting from Varanasi and a lot more. Tune in! Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 25, 2019 • 26min
NL Interviews: Govindraj Ethiraj on data-led stories, public interest journalism and more
In this edition of NL Interviews, Cherry Agarwal speaks to Govindraj Ethiraj about the importance of data-led stories, the credibility of data and the role of data and evidence in the public discourse. Ethiraj is a television and print journalist, who founded IndiaSpend, a data-driven journalistic platform, as well as a fact-checking website, BOOM.The discussion kicks off with the 2019 General Elections. Ethiraj says, "We've seen a steady increase in the amount of misinformation and fake news being generated. It is only getting sharper, more intensive and more creative as we go along." This is adding to the overall election temperature, he adds.Ethiraj also speaks about how data can be used during the 2019 elections. "There are two kinds of data points, one is to do with elections, candidates, what they have done and what they didn't. While they are insightful, they (such data) are a little late in the day to make electoral decisions," he says. However, he adds, over time, data can be used to empower people and informing electoral decisions.Ethiraj also speaks about why there's a need to focus on data and evidence, how data can be used to tell stories in public interest and how it can improve the public discourse. Can data be used to counter divisive, political rhetoric? Can data be used to enforce better governance and accountability? What are the challenges of making data accessible and appealing to a larger audience? The interview addresses all these questions.Listen up! Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 23, 2019 • 18min
“अगर सीटें आती हैं तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है”
राज्यसभा सांसद और लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती एक बार फिर से पाटलीपुत्र लोकसभा सीट से किस्मत आजमा रही हैं. पिछली बार उन्हें पाटलीपुत्र सीट से उनकी ही पार्टी छोड़ गये रामकृपाल यादव ने भाजपा का साथ पकड़ कर पटखनी दी थी. लालू यादव इस बार चुनावी परिदृश्य से ओझल हैं, पार्टी में उत्तराधिकार का मसला जब-तब सिर उठाता है, चुनाव के बाद की परिस्थितियों में क्या राजद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री स्वीकार करेगा और क्या कन्हैया कुमार की पार्टी सीपीआई को गठबंधन से बाहर रखकर आरजेडी ने गलती की है? इन तमाम सवालों पर मीसा भारती के जवाब जानने के लिए सुनें यह पॉडकास्ट. Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 20, 2019 • 55min
एनएल चर्चा 65: साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से बीजेपी का टिकट, जूलियन असांज की गिरफ़्तारी और अन्य
बीते हफ़्ते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित हुई घटनाओं ने कई मायनों में नयी बहस को जन्म दिया. चर्चा में इस हफ़्ते उन्हीं में से तीन बेहद ज़रूरी विषयों- जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद होने व हज़ारों की तादाद में लोगों के बेरोज़गार होने, विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की इक्वाडोर के लंदन स्थित दूतावास से गिरफ़्तारी और भाजपा द्वारा तमाम आतंकवादी गतिविधियों में सह-अभियुक्त रही साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को 2019 के लोकसभा चुनावों में भोपाल से टिकट दिये जाने पर विस्तार से बातचीत की गयी.चर्चा में इस बार ‘प्रभात ख़बर-दिल्ली’ के ब्यूरो चीफ़ प्रकाश के रे ने शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भारतीय जनता पार्टी द्वारा साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से टिकट दिये जाने के बाद एक बार फिर देश में उग्र हिंदुत्व की राजनीति ने जोर पकड़ लिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ने 2019 के लोकसभा चुनावों को धर्मयुद्ध करार दिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयानों के बाद अब धार्मिक भावनाओं के आधार की जाने वाली राजनीति तेज़ हो गयी है, जिसमें देशभक्ति का भी फ़्लेवर पड़ गया है. इसी मुद्दे से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि जिस तरह की उनकी छवि है व जिस तरह के उनपर आरोप हैं, उसके बाद उन्हें या उन जैसे किसी व्यक्ति के उम्मीदवार बनाये जाने के कुछ मक़सद होते हैं. ध्रुवीकरण होता है और जीत की संभावनाएं ऐसे में बढ़ जाती हैं. और जबकि भोपाल की सीट भाजपा के लिये सालों से सुरक्षित सीट रही है, तो पार्टी द्वारा ऐसे किसी उम्मीदवार के ऊपर दांव लगाने के पीछे क्या मक़सद हो सकता है?जवाब देते हुये प्रकाश कहते हैं- “उनको खड़ा करने के पीछे जो मक़सद है, उसपर बात करने के पहले हमें यह देखना चाहिए कि उनकी उम्मीदवारी के तकनीकी या कानूनी पहलू क्या हैं. एक समय स्वास्थ्य के आधार पर लालू प्रसाद यादव जमानत की अर्ज़ी दाख़िल करते हैं, तो उनकी अर्ज़ी खारिज़ कर दी जाती है और यहां स्वास्थ्य के नाम पर एक व्यक्ति जमानत पर बाहर है और वह जमानत भी अपने आप में सवालों के घेरे में है. एक और मामला हार्दिक पटेल का भी है, जिन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गयी. तो प्रज्ञा ठाकुर के मामले में यह एक बड़ा सवाल है और इसमें चुनाव आयोग के काम-काज पर भी सवालिया निशान है. मुझे लगता है कि आने वाले वक़्त में जब इन सब के कानूनी पहलुओं पर बहस होगी, उनका विश्लेषण किया जायेगा तब अदालतों को भी इसमें क्लीनचिट नहीं दी जा सकती है.”प्रकाश ने आगे कहा- “मुझे लगता है कि इस कैंडिडेचर के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साफ़-साफ़ घोषणा है कि अब हम उस मुक़ाम पर खड़े हैं, जहां हमें पर्दादारी की बहुत ज़रूरत नहीं है.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 19, 2019 • 1h 50min
Hafta 220: Jallianwala Bagh, Julian Assange, Sadhvi Pragya and more
In this week’s episode, host Abhinandan Sekhri is joined by Madhu Trehan, Anand Vardhan, Manisha Pande, and author Kishwar Desai. The podcast starts off with a discussion on Desai’s latest book, Jallianwala Bagh, 1919: The Real Story, and why she believed that this was a book that needed to be written. She says that writing the book became “a journey of discovery” for her as she uncovered unknown facts of the incident like the “sadistic tortures that were inflicted on the people of Amritsar”, especially in its build-up and aftermath. The panel also discusses the importance of an apology, as opposed to regret, from Britain now. Anand observes that although “national psyches have this need for reconciliation with historical memory”, after the decades that have passed, “even if it [an apology] comes, it would not serve that instrumental purpose.”Abhinandan shifts the conversation towards the arrest of Julian Assange and the panel debates if his work qualifies as ethical journalistic enterprise or if it is an instance of the phenomenon of ‘information banditry’, as Anand puts it. Madhu says, “What they did was they just hacked everything and dumped it all…the way it was done was not journalism.” The panel agrees that editorial discretion is crucial when dealing with data as raw as this and that it should have been processed in a more refined manner to serve public interest.The panel picked up the recent appointment of Sadhvi Pragya by the BJP to contest the seat in Bhopal. While the panel was initially unsurprised by this decision, given the Hindutva roots of the party, Abinandan points out how indefensible this decision was. He says, “He [Kamal Nath] was in politics, he’s accused of that [1984 anti-Sikh riots] and in continuation, he got a ticket again. Sadhvi Pragya has got a ticket because of her accusation…there’s a big difference.” Anand says that Pragya embodies the victimhood narrative that is “deeply entrenched in the psyche [of the voters] that they [the BJP] want to appeal to”.The discussion steers towards: what makes a great leader and why. The panel also talks about Mukesh Ambani’s endorsement of Milind Deora, a Congress candidate. For this and more, listen up. Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 18, 2019 • 41min
Reporters Without Orders Ep 63: The Ambani-IANS connection, hate speech, GoT and more
This week’s Reporters Without Orders features host Cherry Agarwal with Newslaundry's head of research Ayush Tiwari and desk writer Gaurav Sarkar. The panel talks about the impact Sandeep Bamzai’s tutelage has had on IANS, a petition presented to the Supreme Court seeking permission for Muslim women to offer namaaz in mosques and Maneka Gandhi’s comments on the un-secret nature of secret ballots.Ayush kickstarts the discussion with his own article about how a news agency, IANS, that has off late become "a part of the larger trend of media layoffs" as it suffocates under the corporate ownership of Mr Anil Ambani. He reveals examples of reporters at IANS and establishes a growing pattern alongside other media organizations such as Vice and Buzzfeed. The panel goes on to discuss the intricacies of corporate ownership and the direct influence they exercise on editorial management. Ayush also talks about a Swarajya Magazine report about how the family of a minor Dalit girl who was kidnapped by a man that happened to be Muslim were denied the right to file an FIR by the police since they did not want it to flare up into a ‘Hindu-Muslim’ issue. The panel then went into discussing the implications of ‘pseudo-secularism’ that dominates the Indian narrative today.Gaurav discusses an archaic ritual that Shashi Tharoor made a mockery of himself participating in. The ritual, called ‘Tulabharam’, is one where a person’s “BMI is weighed in phool, phal and gold” and Tharoor fell off the scales having to endure 11 stitches afterwards. The panel delved into the problems associated with the endorsement by politicians of religious traditions such as these and the implications that such engagement had on the sentiments of the voting public. He also brought up a recent plea put before the Supreme Court by a Pune-based couple that sought permission to let women offer prayers in mosques. The discussion questioned the fast-paced nature of the proceedings as well nuances of religion such as the “contest between personal liberty and religion” and the stronghold of the religious orthodoxy.Cherry drives the conversation towards the larger question of the responsibility of the media. She references a specific tweet by Times Now that says, “A political leader has said something communal, listen in” and questions the ethicality of cashing in on hate in the name of journalism. While Ayush agrees that its ‘clickbait’ tone was questionable, it is not the place of the media to dictate whether something, communal or otherwise, should be censored or not. The media should contextualize information, is what the panel agrees on, irrespective of that content that is. Cherry goes on to talk about Maneka Gandhi’s comment on not helping Muslim voters if they didn’t vote for her and lays down the reality of contemporary times wherein the concept of secret ballots is conceptually dead. With the Election Commission now providing politicians with a constituency-wise break up of votes via Form 20, the panel dived deep into the vulnerability of voters today.The panel also brings up the ineffectiveness of the EC and the Supreme Courts backhand comments on its exercise of powers, the trend of the Supreme Court gaining an “inordinate amount of power”, as well as the oft-ignored details of Islam in terms of its various schools of law.This and more, so listen up! Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 13, 2019 • 51min
एनएल चर्चा 64: राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, इमरान खान का नरेंद्र मोदी प्रेम और अन्य
बीता हफ़्ता तमाम तरह की घटनाओं का गवाह रहा. इस बार की चर्चा जब आयोजित की गयी, उस वक़्त देश के कुछ हिस्सों में साल 2014 के बाद तनाव, द्वंद्व, संघर्ष, भ्रम व मायूसी के 5 सालों से हताश-निराश अवाम एक बार फ़िर उम्मीदों से बेतरह लैश होकर पहले चरण के मतदान में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रही थी. चर्चा में इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले, चुनाव के धड़कते माहौल में सीमा पार से आती ख़बर जिसमें इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी पार्टी द्वारा बहुमत हासिल करने पर भारत-पाकिस्तान संबंधों में गर्माहट आने की उम्मीद जतायी, बस्तर में नकुलनार इलाके में हुआ नक्सली हमला जिसमें बीजेपी के विधायक व 5 सीआरपीएफ जवानों समेत कुल छः लोगों की मृत्यु हो गयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग अपडेट व भाजपा के चुनावी घोषणापत्र पर चर्चा की गयी.इस हफ़्ते की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले से चर्चा की शुरुआत करते हुए, अतुल ने सवाल किया कि एक तरफ़ सरकार द्वारा इस मामले से लगातार पीछा छुड़ाने के प्रयास लगातार जारी रहे और अब चुनावी उठापटक के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह का फैसला दिये जाने के बाद अब आप राफेल मामले को किस तरफ़ जाता हुआ देखते हैं? क्या बात राहुल गांधी द्वारा लगातार लगाये जा रहे आरोपों की दिशा में आगे बढ़ गयी है?जवाब में पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करते हुए हृदयेश ने कहा, “यहां पर एक तो प्रोसीजर का मामला इन्वाल्व है, इसके साथ ही मामला पॉलिटिकल परसेप्शन का भी हो गया है. इस वक़्त कांग्रेस ने मैनिफेस्टो में जिस तरह से ख़ुद को सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर ऊपर दिखाने की कोशिश की थी, इसके बाद प्रोपराइटी के मामले में एक बयानबाजी करने में उसको मदद मिलेगी.”इसी कड़ी में मीडिया के नज़रिये से इस मसले को देखते हुए अतुल ने सवाल किया कि इस मौके पर यह फैसला सरकार के लिए तो झटके जैसा है, लेकिन जबकि पिछले पांच सालों में लगातार यह बात चर्चा में रही कि मीडिया पर सरकारी दबाव है, मीडिया की आज़ादी के लिहाज़ से इसे कैसे देखा जाये? क्या मीडिया के लिए यह ऐसा मौका है, जो आगे बार-बार ऐतिहासिक संदर्भों में याद किया जायेगा?जवाब देते अनिल ने कहा, “देखिये! जहां तक मीडिया की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने ये सारी बात मीडिया के संदर्भ में नहीं की हैं. उसके द्वारा पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करना दरअसल एक लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करना है. वर्ना भारत में, ख़ास तौर से पिछले कुछ सालों में मीडिया में जो कुछ उठापटक, मनमुताबिक़ या डर वश फेरबदल चल रहा है, यह सबकुछ सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने हो रहा. तो अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया की स्वतंत्रता का असल में पक्षधर होता, तो वह ज़रूरी दखल देता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की चिंता ये नहीं है. दूसरी बात ये है कि जो मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो भी इस हालत में नहीं हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया के पक्ष में कोई सकारात्मक बात करता है तो वो उसका फ़ायदा ले सकें, उसे आगे ले जा सकें. जो ज़्यादातर मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो बिना नाखून व दांत वाली संस्थाओं में तब्दील हो गये हैं.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 12, 2019 • 1h 46min
Hafta 219: Model Code of Conduct, Dalit politics, AgustaWestland and more
In this week’s episode, host Abhinandan Sekhri is joined by Madhu Trehan, Raman Kirpal, Manisha Pande and journalist Sudipto Mondal.The podcast kicks off with Sudipto talking about the book he’s working on which is centred around the 25-year history of the Ambedkar Students' Association. Although the book was originally intended to be about Rohith Vemula, the Dalit PhD student and ASA member who committed suicide in 2015, Sudipto says: "There were four other students who were suspended with him, do they not deserve to be written about? Just because they didn’t kill themselves? That for me became a big question … that made me expand my quest.”Sudipto also talks about the politics of violence used by the ASA, adding that it's "not pro-violent that it attracted the greyhounds and the anti-Naxal police”. He points out that the frames used to categorise Dalits as "thugs" is what constituted the foundation of their fight. He says it's in the granularity of the politics of representation that we can find the essence of the fight between the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad and Vemula.Abhinandan steers the discussion towards the elections and the panel reminisces on how it has changed over the years. They debate the idea of voter suppression as a genuine concern or general paranoia. Madhu observes, “This election is going to stand out for messing up of the honesty of the elections. Because everywhere you go, it is far more sophisticated than booth capturing.” The conversation moves to the Model Code of Conduct which, as Raman says, "does not even exist anymore”. They discuss how the EC isn't doing itself any favours with its soft attitude, especially in terms of its (non)response to things like NaMo TV. Sudipto compares it to a “nagging South Delhi parent” in the way it's executing its duties.Shifting to AgustaWestland, the panel talks about the recent attack on the credibility of journalists such as Shekhar Gupta. They delve into the ED chargesheet's accusations that journalists such as Gupta were bought off, and describe it as an "outright criminal act" that immediately disregards years of great journalistic practice.The conversation also covers what's right and what's wrong with Dalit politics, the problems with the phrase "Main Bhi Chowkidar" and its casteist connotations, the importance of media literacy—and a whole lot more.Listen up! Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.

Apr 11, 2019 • 45min
Reporters Without Orders Ep 62: #AugustaWestlandScam, Uttar Pradesh politics & more
This week’s Reporters Without Orders features host Cherry Agarwal, Head of Research Ayush Tiwari, Desk Writer Gaurav Sarkar and Newslaundry Hindi reporter Basant Kumar. The panel talks the Enforcement Directorate's fourth supplementary chargesheet in the AgustaWestland chopper deal scam, increasing propaganda in daily soaps, the impact of communal violence in Western Uttar Pradesh, Congress' demonetisation sting operation and more.Speaking about the allegations that journalists "toned down" reportage on the AgustaWestland scam, Ayush says: “ Manu Pubby and Shekhar Gupta broke the story on the Augusta Westland scam and if they wouldn’t have done it we wouldn’t have known about it." He also makes a case for why there is a need to look at the full chargesheet, going beyond sections of the document that was leaked to the media. He adds these are baseless allegations and do not make a strong case against the three journalists who were allegedly named.Moving on, Gaurav points out political propaganda is increasingly being embedded in daily soaps such as Bhabhiji Ghar Par Hain. He also talks of various such videos doing the rounds on Twitter. He questions the intent of such propaganda and says, “The Model Code of Conduct is in effect, is this (such content) even allowed during this period?” Basant speaks about his ground report from Western UP which focused on understanding the impact of communal violence in the area. He is surprised that many young voters have fallen into a communal trap and are in favour of divisive politics. He says, “Hindus have hatred for Muslims while Muslims are fearful." There's also talk about what UP politics and 2019 general elections. Gaurav talks about a sting operation shown by the Congress and raises questions about its credibility. He feels it's edited and says: “How do you get hard cuts in raw unedited video?” Hosted on Acast. See acast.com/privacy for more information.